कौन कहेगा आपको ‘माननीय जी’ साहब! सावधान हो जाएं, वरना वह दिन दूर नहीं जब…


संसदीय लोकतंत्र में विरोधी दल सरकार के ही अंग माने जाते हैं.

जिस सभा में अच्छे लोग न हों, वह सभा ही नहीं है. जो लोग न्याय की बात नहीं करते वे अच्छे आदमी नहीं हैं. और जो लोग राग-द्वेष तथा मोह को छोड़ कर न्याय की बात करते हैं, वे ही अच्छे आदमी हैं. 

आप सैकड़ों परिभाषाओं के द्वारा प्रजातंत्र की व्याख्या कर सकते हैं, किंतु यथार्थ में इसकी एक परिभाषा यह भी है कि जन समुदाय आत्म अनुशासित रहे. आरोपित अनुशासन कम रहे, आत्म अनुशासन अधिक.

Patna: इन शब्दों को गौर से पढ़ें. बिहार विधानसभा के अंदर सदन में यानी सभा कक्ष में दीवारों के ऊपर लकड़ी की पट्टी है. उस पर ऊपर के शब्द सुभाषित अंकित हैं. कल का दिन यानी बीते मंगलवार को बिहार विधानसभा में जो कुछ हुआ बहुत ही शर्मसार था. ये शब्द भी सदा के लिए शर्मसार हो गए.  

अब प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न पूछा जाएगा-देश के किस राज्य में विधानसभा के अंदर सदन में पुलिस को प्रवेश करना पड़ा था. और जबरन विरोधी दलों के विधायकों को घसीट कर निकालना पड़ा था. अंग्रेजों के समय का विधानसभा भवन है. हालांकि, नीतीश सरकार ने नया भवन बनाया है पर सत्र उसी पुराने में चलता है, जिसे ऐसा गंदा दिन देखना पड़ा. गुलामी के दिनों तक में ऐसा नहीं हुआ था, जब क्रांति चरम पर थी. 

   

सोचिए विधायक जी…जो विधान बनाते हैं, कानून बनाते हैं, उनको पुलिस को सदन से जबरन निकालना पड़ा. जब सदन में रात में नीतीश कुमार (Nitish Kumar) बिहार विधानसभा में बोल रहे थे, उससे उनका दर्द झलक रहा था. उन्होंने कहा, ‘1985 से विधायक रहा. इस सदन का सदस्य रहा. चौथी बार मुख्यमंत्री हूं. आजतक हमने ऐसा दृश्य नहीं देखा था. चर्चा से क्यों भाग रहे हैं, बोलिए तो क्या गलत है. कई राज्यों में यह व्यवस्था है. नया विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 (Bihar Special Armed Police Bill 2021) जनता की रक्षा के लिए है, उसे कष्ट पहुंचाने के लिए नहीं.’ हालांकि, उन्होंने बड़ी ईमानदारी से यह भी कहा कि अफसरों को जनता को बताना चाहिए कि ये कानून क्या है. 

बिहार विधानसभा में पुलिस बिल को लेकर जमकर हुआ हंगामा,तेजस्वी बोले-सरकार अपना रही तानाशाही रवैया

हर जगह खबर चल रही है. विधान परिषद में सत्ता-विपक्ष के लोग उलझ पड़े. हाथापाई तक नौबत आ गई. विपक्ष के नेता मुख्यमंत्री से माफी की मांग कर रहे हैं. लोकतंत्र में कोई भी समस्या संवाद से ही हल हो सकता है. सबको अपनी बात कहने का अधिकार है. पर माननीय हैं, माननीय सा व्यहार करिए. इज्जत कमाई जाती है. सम्मान न मांगने से मिलता है, नाहिं बाजार में बिकता है…वह पुलिस, वह अफसर उन विधायक जी की बात मानेगा, जिसने घसीट कर माननीय को बाहर फेंका हो. 

इस दर्शक को 1980 से होश है. तब से शगल रहा है-अखबार पढ़ना. रेडियो, टीवी पर समाचार सुनना. बड़े-बजुर्गों के बहस-मुबाहिसों को सुनना. तर्क-वितर्क…पक्ष-विपक्ष..पर सदन में शोरगुल-हंगामा और यूपी की घटना मात्र याद है. अभी सोमवार 22 मार्च को ही बिहार दिवस पर गौरवान्वित सिर शर्म से झुक गया. सदन के अंदर की करतूत-वह भी ऐसे दिन जब देश राम मनोहर लोहिया को श्रद्धांजलि दे रहा था. भगत सिंह का शहीद दिवस था. भगत सिंह ने भी तब के एसेंबली में बम फेंका था, जो आज का जो लोकसभा भवन है. वह बहरों को सुनाने के लिए था. गुलामी से मुक्ति के लिए…आज हम स्वतंत्र हैं. विरोध का तरीका अराजक न हो इसका खयाल रखना चाहिए. सावधान हो जाएं…वरना वह दिन दूर नहीं जब बिहार विधान मंडल के अंदर खूनखराबा हो…पर बिहार विधानसभा-विधान परिषद में जो कुछ भी हुआ, उसे काला मंगलवार-बुधवार कहना पड़ेगा. बिहार शर्मसार हुआ. अफसोसजनक…निराशाजनक!



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