August 2, 2021

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अपने वतन लौटने लगे परिंदे, 15 दिनों में 7000 किलोमीटर की भरेंगे उड़ान


Jaisalmer : अपनी ध्वनि, उड़ान और अठखेलियों से 7 महीने पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर (Jaisalmer News) जिले के तालाबों को आबाद रखने वाली कुरजा पक्षी अब गर्मियों की दस्तक के साथ अपने वतन लौटने लगे हैं. परदेसियों के वापसी से पक्षी प्रेमियों में उदासी है. 

चारों ओर कुर्र-कुर्र की आवाज, आसमान में ‘वी’ की आकृति में उड़ते पक्षी और सूरज की पहली किरण के साथ जो इंसान ये नजारा देखता है, वह इस कदर रोमांचित हो उठता है ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने उसे कोई नायाब तोहफा दिया है. जालौर के तालाबों को आबाद रखने वाले अब अपने वतन की लौटने लगे हैं. बदलते मौसम और गर्मी की शुरुआत के साथ अप्रवासी पक्षी (Kurja birds) अपने वतन लौटने लगे हैं. सात समंदर पार कर हर साल परिदें यहां आते हैं. लेकिन जैसे ही मौसम बदलता है. तो अपने वतन की तरफ फिर से लौटने लगते हैं.

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कुरजा जिसे अंग्रेजी में डेमोसाइल क्रेन (Domicile crane) के नाम से जाना जाता है. कुरजा सारस प्रजाति का प्रवासी पक्षी है. मानसून की बरसातों के बाद सितम्बर महीने में पश्चिमी राजस्थान और कच्छ के तालाबों पर पहुंचने वाले यह पक्षी सर्दियों का मौसम एक तालाब से दूसरे तालाब पर पड़ाव डालकर बिताते हैं. गर्मियों में यह पक्षी मंगोलिया, मध्य एशिया, दक्षिणी रूस और पूर्वी यूरोप के ठंडे घास मैदानों में प्रजनन करने और चूजों को पालने में समय व्यतीत करते हैं. अगस्त तक चूजों के बड़े हो जाने के बाद और सर्दियों की शुरुआत से पहले यह पक्षी वापिस भारत की तरफ उड़ान भर लेते हैं. पक्षी प्रेमियों का कहना है कि राजस्थान की लोक संस्कृति में कुरजा गहराई से जुड़े हुए हैं और एक विशिष्ट स्थान रखते हैं. परिदों की वतन वापसी पर पक्षी प्रेमी उदास हैं. 

भारत (Domicile crane in India) से उड़ान भरने के बाद 15 दिनों में 5000 से 7000 किलोमीटर की दूरी यह आसानी से तय कर लेते हैं. इस दौरान हिंदुकुश, पामीर, कराकोरम और हिमालय की ऊंची चोटियों के साथ विभिन्न देशों की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को भी पार करते हुए अपने वतन लौट जाते हैं. 

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