DNA ANALYSIS: मानवाधिकारों पर अमेरिकी रिपोर्ट का सच, भारत को लेकर US की इन चिंताओं का मतलब क्‍या है?


नई दिल्‍ली:  आज हम सबसे पहले आपसे ये पूछना चाहते हैं कि पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे को आप देशद्रोह मानेंगे या अभिव्यक्ति की आजादी मानेंगे. हमें यकीन है कि आपमें से ज़्यादातर लोग पाकिस्तान जिंदाबाद  के नारे को अपने खिलाफ एक बगावत मानेंगे, लेकिन अमेरिका के लिए ये अभिव्यक्ति की आजादी है और वो चाहता है कि भारत में रहने वाली देश विरोधी ताकतों पर इसके लिए कोई कार्रवाई भी न हो.

मानवाधिकारों पर अमेरिका की रिपोर्ट

इस बात का जिक्र उसने मानवाधिकारों को लेकर जारी की गई अपनी एक ताजा रिपोर्ट में किया है, जिसका आज हम संपूर्ण विश्लेषण करेंगे क्योंकि, अमेरिका सैनिक हथियारों का तो बड़ा निर्माता है ही और अब वो मानवाधिकारों को भी एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है. इस रिपोर्ट में अमेरिका ने पूरी दुनिया में मानवाधिकारों की मौजूदा स्थिति की समीक्षा की है और भारत को लेकर भी इसमें चिंता जताई गई है. इसके मुताबिक, अमेरिका को लगता है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी सीमित हुई है, प्रेस की स्वतंत्रता पर पाबंदियां लग गई हैं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों में कटौती हुई है, जिसका असर भारत के लोकतंत्र पर पड़ा है. ये सब बातें इस रिपोर्ट में लिखी हैं.

हेड मास्‍टर की तरह पूरी दुनिया को क्‍यों सिखा रहा अमेरिका?

इसमें अमेरिका ने दुनिया के 194 देशों को बताया है कि उनके देशों में मानवाधिकारों की स्थिति क्या है और वो भविष्य में क्या कर सकते हैं. यानी अमेरिका एक हेड मास्‍टर की तरह पूरी दुनिया को ये सिखा रहा है कि उन्हें मानवाधिकारों को लेकर क्या कदम उठाने चाहिए, लेकिन विडम्बना देखिए कि इस रिपोर्ट में कहीं भी अमेरिका ने खुद का जिक्र नहीं किया है. जबकि वहां लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था में ऐतिहासिक गिरावट आई है, नस्लीय भेदभाव लगातार बढ़ रहा है, एक पूर्व सैनिक को अपनी चोटें दिखा कर अपनी देशभक्ति साबित करनी पड़ रही है और अश्वेत नागरिकों में असुरक्षा की भावना है. लेकिन इसके बावजूद अमेरिका मानवाधिकारों को लेकर इस रिपोर्ट में कहीं भी खुद का जिक्र नहीं करता और भारत को कई तरह के उपदेश देता है.

रिपोर्ट में भारत को लेकर कही ये बातें 

सबसे पहले आप ये समझिए कि इस रिपोर्ट में अमेरिका ने भारत को लेकर क्या कहा है?

भारत के संदर्भ में 30 से ज्‍यादा पन्ने इस रिपोर्ट में हैं और इसमें भारत को लेकर कई विषयों पर चिंता जताई गई है. ये विषय हैं- गैर कानूनी गिरफ्तारियां, अभिव्यक्ति और प्रेस की आजादी पर पाबंदी, भ्रष्टाचार, धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर संकीर्ण मानसिकता, इंटरनेट पर पाबंदी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा.

आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप 

अमेरिका ने इन सभी विषयों पर भारत में मानवाधिकारों की समीक्षा की है. हालांकि ये सभी मुद्दे और बातें सुनने में तो अच्छी लगती हैं लेकिन जब आप इस रिपोर्ट की गहराई में जाएंगे तो आपको समझ आएगा कि किस आधार पर अमेरिका दुनियाभर के देशों को ये सर्टिफिकेट बांट रहा है और यहां एक महत्वपूर्ण सवाल ये भी है कि अगर अमेरिका इन सभी विषयों का जिक्र अपनी रिपोर्ट में करता है तो क्या ये भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं है?

इस सवाल का जवाब आपको इसी रिपोर्ट में मिल जाएगा. इसमें अभिव्यक्ति की आजादी पर उपदेश देते हुए प्रशांत भूषण के एक मामले का जिक्र किया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कोर्ट की अवमानना का दोषी माना था, लेकिन ये रिपोर्ट कहती है कि सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ था.  यानी इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले अमेरिका के सांसद और अधिकारी खुद को हमारे देश की सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर मानते हैं और इनके मुताबिक, भारत का सुप्रीम कोर्ट ही अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ काम कर रहा है.

america

न्यायिक व्यवस्था पर बड़ा हमला

हमें लगता है कि अमेरिका का ऐसा सोचना हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था पर बड़ा हमला है और इस रिपोर्ट के जरिए इस पूरी व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश की गई है.

इसे आप कुछ और बातों से भी समझ सकते हैं. आपको याद होगा कि वर्ष 2019 और 2020 के शुरुआती महीनों में संसद द्वारा पास किए गए नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे और इस दौरान बेंगलुरु की एक रैली में अमूल्या लियोना नाम की एक लड़की ने पाकिस्तान जिंदा के नारे लगाए थे. तब पुलिस ने उसके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था और कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान उसे जमानत भी मिल गई थी. लेकिन अमेरिका की इस रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में पुलिस की तरफ से हुई कार्रवाई और देशद्रोह की धाराएं लगाना अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ था. अब आप खुद तय कीजिए कि क्या भारत में पाकिस्तान जिंदाबाद कहना देशद्रोह नहीं है? क्योंकि ये रिपोर्ट ऐसा ही कहती है.

अमेरिका की टिप्‍पणी उसी की पोल खाेलती है

हमारा मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर अमेरिका की इस तरह की टिप्पणी उसी की पोल खोलती है क्योंकि, अमेरिका जब इस तरह की घटनाओं का समर्थन करता है तो वो भूल जाता है कि जब इसी तरह कुछ लोग 6 जनवरी को राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों के खिलाफ अमेरिका की संसद में घुस गए थे. तब उसने इन लोगों की अभिव्यक्ति का सम्मान नहीं किया था. तब अमेरिका की संसद में इन लोगों पर गोलियां चलाई गई थीं और 6 लोग मारे गए थे.

यही नहीं बड़ी टेक्‍नोलॉजी कंपनी ट्विटर ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप समेत कई बड़े नेताओं के अकाउंट भी बंद कर दिए थे. सवाल है कि आखिर तब अमेरिका को अभिव्यक्ति की आजादी क्यों याद नहीं आई और अमेरिका ने इसका जिक्र अपनी रिपोर्ट में क्यों नहीं किया.

मानवाधिकारों की स्थिति  

हकीकत तो ये है कि अमेरिका अपने देश में मानवाधिकारों की चिंताजनक स्थिति को लेकर कभी कुछ लिखता ही नहीं है. वो बस भारत और दूसरे देशों को उपदेश देता है क्योंकि, ये उसकी विदेश नीति को भी सूट करता है.

रोहिंग्‍या शरणार्थियों की सुरक्षा पर जताई चिंता

अब हम आपको इस रिपोर्ट के दूसरे भाग के बारे में बताते हैं, जिसमें शरणार्थियों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई है. इसमें लिखा है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत के कई राज्यों में डिटेंशन सेंटर्स में रखा गया है. यही नहीं, इस रिपोर्ट में अमेरिका ने भारत सरकार के उस फैसले की भी आलोचना की है, जिसमें कुछ रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस म्यांमार भेजने का फैसला किया गया है.

बड़ी बात ये है कि शरणार्थियों के मुद्दे पर भारत को लेक्चर देने वाला अमेरिका ये भूल जाता है कि वो खुद मेक्सिको और दूसरे देशों से आने वाले शरणार्थियों के साथ कैसा व्यवहार करता है. इसे आप वर्ष 2018 की उन तस्‍वीरों से देख सकते हैं, जब डोनाल्‍ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति थे और मेक्सिको से अमेरिका आने वाले शरणार्थियों को सीमा पर ही रोकने के लिए जबरदस्त कार्रवाई की गई थी.

यही नहीं उस समय अमेरिका ने बड़ी बेरहमी से डिटेंशन सेंटर्स में दो दो साल के बच्चों को भी उनके माता पिता से अलग कर दिया था. तब रोते बिलखते इन मासूमों की तस्वीरें दुनियाभर में बहस और चिंता का विषय बन गई थीं. लेकिन सोचिए, क्या तब किसी देश या भारत ने अमेरिका को कोई उपदेश दिया या इस तरह की रिपोर्ट जारी की. लेकिन अमेरिका ऐसा करता है और वो ऐसा करके दूसरे देशों पर दबाव भी बनाता है.

अमेरिका की डिजाइनर रिपोर्ट 

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इसी रिपोर्ट में अनलॉफुल एक्‍टीविटीज प्रिवेंशन एक्‍ट (Unlawful Activities (Prevention) Act) के तहत जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और सफूरा जरगर की गिरफ्तारी की आलोचना की गई है. वो भी तब जब इस कानून के तहत तभी कार्रवाई होती है, जब मामला देश की सुरक्षा और उसकी संप्रभुता से जुड़ा हो. यानी इन लोगों पर देशद्रोह का आरोप था और इसलिए इन पर कार्रवाई हुई. लेकिन अमेरिका को लगता है कि ये गिरफ्तारियां भी गैर कानूनी हैं. अब आप खुद सोचिए कि क्या इस रिपोर्ट का कोई अर्थ है. असल में इस तरह की रिपोर्ट्स अमेरिका अपनी विदेश नीति को सही ठहराने के लिए तैयार करता है. इसलिए आप इसे डिजाइनर रिपोर्ट भी कह सकते हैं.

दोहरे मापदंड का सबसे बड़ा सबूत

यूएस स्‍टेट डिपार्टमेंट की तरफ से तैयार की गई इस रिपोर्ट को एंटनी ब्लिंकेन ने वहां की संसद में पेश किया, जो अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट हैं. इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के सामने भी मानवाधिकारों को लेकर कई चुनौतियां हैं, जिनसे मजबूती से लड़ना होगा. लेकिन हमारा सवाल यहां ये है कि अगर अमेरिका में मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, नस्लीय हमले होते हैं और हिंसा भड़कती है तो अमेरिका उसे अपने लिए चुनौती मानता है जबकि दूसरे देशों को वो एक पंक्ति में खड़ा करके इसी पर उपदेश देता है और उनके प्रति अपनी नाराजगी भी जाहिर करता है. हमें लगता है कि अमेरिका के दोहरे मापदंड का इससे बड़ा और कोई सबूत नहीं हो सकता है. 

पूर्व अमेरिकी सैनिक को साबित करनी पड़ी देशभक्ति

कल हमने आपको अमेरिका की सेना में 20 साल तक काम कर चुके ली वॉन्‍ग के बारे में बताया था, जो एशियाई मूल के अमेरिकी नागरिक हैं. उन्होंने कल अपनी शर्ट उतार कर शरीर पर आई चोटें दिखाते हुए अमेरिका से ये पूछा था कि क्या ये चोटें देशभक्ति साबित करने के लिए काफी हैं? ये चोटें उन्हें अमेरिका की सेना की तरफ से लड़ते हुए ही आई हैं.

ली वॉन्‍ग अमेरिका में बढ़ते नस्लीय भेदभाव से नाराज हैं. सोचिए, जो देश पूरी दुनिया को मानवाधिकारों पर उपदेश दे रहा है. उसी देश में एक पूर्व सैनिक को अपने कपड़े उतार कर खुद को देशभक्त साबित करना पड़ रहा है.  इस पूर्व सैनिक की बातें अमेरिका के असली चरित्र और उसके दोहरे मापदंड की पोल खोलती हैं.

अमेरिका के जैसा ही एक और देश है ब्रिटेन, जो मानवाधिकारों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करता है. वहां की संसद में तो हमारे देश के नए कृषि कानूनों और इसके खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों पर आए दिन चर्चा होती रहती है और इनमें भारत में चल रहे प्रदर्शनों को लेकर चिंता भी जाहिर की जाती है, लेकिन जब ब्रिटेन में प्रदर्शन होते हैं तो इन पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है, ये वहां से आई कुछ तस्‍वीरें बताती हैं.

इन तस्‍वीरों में आप ब्रिटेन की पुलिस को महिला प्रदर्शनकारियों के साथ अभद्र व्यवहार करते हुए देख सकते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि ब्रिटेन में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर आलोचना हुई हो. दरअसल, वहां इस तरह की कोई परंपरा ही नहीं है. 

अमेरिकी रिपोर्ट का सच 

जब हम अमेरिका की संसद में पेश की गई इस रिपोर्ट का अध्ययन कर रहे थे तो हमें इसमें वो पन्ना भी मिला, जिसमें अमेरिका ने इस रिपोर्ट को जारी करने का अपना मकसद बताया है. अमेरिका कहता है कि उसे गर्व है कि वो पिछले 244 वर्षों से मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए पूरी दुनिया का नेतृत्व कर रहा है और अमेरिका खुद को इस क्षेत्र में भी चैम्पियन मानता है. हमें लगता है कि अमेरिका की ये डिजाइनर छवि है, जो उसने इस तरह की रिपोर्ट्स और थिंक टैंक की मदद से बनाई है. कड़वी सच्चाई ये है कि असली अमेरिका वो है, जिसके बारे में पूर्व सैनिक ली वॉन्‍ग पूरी दुनिया को बता रहे हैं क्योंकि, अश्वेत लोगों के खिलाफ हिंसा, एशियाई मूल के लोग, जिनमें भारतीय भी हैं. उन पर हमले और गन कल्चर की वजह से मारे जाने वाले सैकड़ों लोग अमेरिका की हकीकत है, जिसे वो हमेशा छिपाने की कोशिश करता रहा है.



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