July 25, 2021

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नागा साधु बनने का रहस्य, करना पड़ता है खुद का पिंडदान, 6 साल के कठिन तप के बाद मिलती है उपाधि


नई दिल्ली: कहते हैं कुंभ के दौरान गंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं. कुंभ का नाम सामने आते ही एक तस्वीर सामने आती है जिसके बिना कुंभ शायद अधुरा ही माना जाता है, वो हैं नागा साधु. कुंभ के दौरान यहां का सबसे बड़ा आकर्षण होता है नागा साधु- नागाओं को देखने के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी लोग आते हैं. अखाड़ों में नागा संन्यासियों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है. कुंभ आए आम श्रद्धालुओं के लिए पूरे शरीर पर भभूत लगाए कड़ाके की ठंड में साधनारत नागा साधुओं को देखना भी एक विशिष्ट अनुभव होता है.

रहस्यों से भरी होती है नागा साधुओं की जिंदगी 
नागा साधुओं की जिंदगी कठिनाईयों से भरी हुई होती है. आम इंसान ऐसी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता. इनके बारे में हर बात निराली होती है. जटाओं से लेकर शरीर पर भस्‍म तक, इनके जैसा कोई और नहीं दिखता. ये इतना कठिन जीवन जीते हैं जिसके बारे में आम लोग सोचते तक नहीं. नागा साधुओं का जीवन सबसे अलग होता है. इन लोगों को दुनिया में क्‍या हो रहा है, इस बारे में इन्‍हें कोई मतलब नहीं होता.

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नागा साधु की जटाएं उनका अभिमान
अखाड़ों के वीर शैव नागा सन्यासी अपनी लंबी जटाओं को बिना किसी भौतिक सामग्री इस्तेमाल किए हुए खुद को रेत और भस्म से ही संवारना पड़ता है. बता दें कि इन साधुओं की जटाएं 10 फीट तक लंबी होती हैं. इतनी लंबी जटाओं को बढ़ाने में करीब 30 से 40 साल तक लग जाते हैं. इन जटाओं को संभालना बेहद ही मुश्किल भरा काम होता है. नागा साधु बड़ी ही बखूबी से इन जटाओं को संभालते हैं. नागा साधुओं के सत्रह श्रंगार में पंच केश का बहुत महत्व है. इसमें बालों को 5 बार घुमा कर लपेटा जाता है.

गर कोई आम आदमी नागा साधु बनने के लिए जाता है, तो अखाड़ा उसके परिवार के बारे में पूछताछ करता है. इसके बाद उसे कठिन दौर से गुजरना होता है. ये परीक्षा केवल नागा साधु बनने तक की नहीं होती. एक बार नागा साधु बनने के बाद भी काफी मुश्किल भरा जीवन व्‍यतीत करना होता है. इसके कई नियम होते हैं.

  • नागा साधु को भस्म और रूद्राक्ष धारण करना आवश्‍यक होता है. यही वजह है कि अखाड़े में जो नागा साधु दिखते हैं, वे इसी रूप में दिखते हैं. रोज सुबह स्नान के बाद नागा साधु सबसे पहले शरीर पर भस्म रमाते हैं.
  • ये वस्‍त्र नहीं धारण कर सकते. अगर बहुत जरूरी हो तो तन पर केवल एक गेरुआ रंग का वस्‍त्र धारण करने की अनुमति होती है. साधु दिन में एक समय भोजन करते हैं. ये भोजन भिक्षा मांगकर एकत्रित किया हुआ होता है.
  • ये हमारी-आपकी तरह पलंग पर नहीं सोते. केवल जमीन पर सोने का नियम होता है. इस दौरान जमीन पर कुछ बिछाते भी नहीं. ये किसी से कोई मतलब नहीं रखते. ना ही किसी की निंदा, ना ही किसी की प्रशंसा.
  • नागा साधु बनने के लिए लग जाते हैं 12 साल लग जाते हैं. नागा पंथ में शामिल होने के लिए जरूरी जानकारी हासिल करने में छह साल लगते हैं. इस दौरान नए सदस्य एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते.  कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर यूं ही रहते हैं.
  • नागा साधुओं को सबसे पहले ब्रह्मचारी बनने की शिक्षा दी जाती है. इस परीक्षा को पास करने के बाद महापुरुष दीक्षा होती है. बाद की परीक्षा खुद के यज्ञोपवीत और पिंडदान की होती है जिसे बिजवान कहा जाता है.
  • अगर व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करने की परीक्षा में सफल हो जाता है तो उसे ब्रह्मचारी से महापुरुष बनाया जाता है. उसके पांच गुरु बनाए जाते हैं.(शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश) होते हैं.

खुद का पिंडदान व श्राद्ध 
महापुरुष के बाद नागाओं को अवधूत बनाया जाता है. अवधूत रूप में साधक खुद को अपने परिवार और समाज के लिए मृत मानकर अपने हाथों से अपना श्राद्ध कर्म करता है. ये पिंडदान अखाड़े के पुरोहित करवाते हैं.

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मुगलकाल में चलन में आया अखाड़ा शब्द

पहले आश्रमों के अखाड़ों को बेड़ा अर्थात साधुओं का जत्था कहा जाता था. अखाड़ा शब्द का चलन नहीं था. साधुओं के जत्थे में पीर और तद्वीर होते थे. अखाड़ा शब्द का चलन मुगलकाल से शुरू हुआ.

एक महीने तक चलेगा कुंभ मेला

कुंभ मेला एक महीने तक चलेगा. 12,14 और 27 अप्रैल को शाही स्नान है. देश और विदेश से भारी तादात में स्नान करने के लिए श्रद्धालु यहां पर आते हैं. पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं. जगह-जगह पुलिस जवानों को तैनात किया गया है.

कब-कब शाही स्नान
कुंभ मेले की अवधि कम करने के साथ ही शाही स्नान (Shahi Snan)की संख्या में भी कमी की गई है. पहले  जहां कुंभ मेले के दौरान 4 शाही स्नान होते थे उसे इस बार घटाकर 3 कर दिया गया है. हरिद्वार कुंभ मेला 2021 के दौरान अप्रैल के महीने में 3 शाही स्नान होंगे
पहला शाही स्नान 12 अप्रैल (सोमवती अमावस्या)
दूसरा शाही स्नान 14 अप्रैल (बैसाखी) 
तीसरा शाही स्नान 27 अप्रैल (पूर्णिमा के दिन) 

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