July 30, 2021

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DNA ANALYSIS: कोचिंग कल्चर ऐसे पहुंचा रहा बड़ा नुकसान, समझिए एजुकेशन सिस्टम में बदलाव क्यों जरूरी


नई दिल्ली: आज हम ट्यूशन वाले सॉल्यूशन का DNA टेस्ट करेंगे. इसलिए जो छात्र स्कूल में पढ़ने के बाद हर रोज दो से तीन घंटे अलग अलग विषयों की पढ़ाई के लिए महंगी ट्यूशंस लेते हैं और जो माता-पिता ये मानते हैं कि अगर उनके बच्चों ने ट्यूशन क्लासेज नहीं ली, तो वो फेल हो जाएंगे. उन्हें आज का हमारा ये कीमती विश्लेषण बहुत ध्यान से पढ़ना चाहिए. आज हम उनके सारे डाउट्स क्लियर (Doubts Clear) करने वाले हैं.

BYJU’S और आकाश एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के बीच बड़ी डील

हमारे इस विश्लेषण का आधार है शिक्षा के क्षेत्र की सबसे बड़ी ऑनलाइन कम्पनी BYJU’S और आकाश एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के बीच हुई एक बहुत बड़ी डील. जिसके तहत BYJU’S ने आकाश इंस्टीट्यूट को एक अरब डॉलर यानी लगभग साढ़े सात हजार करोड़ रुपये में खरीद लिया है. ये कीमत ई कॉमर्स कंपनी Nykaa और Lenskart जैसी कंपनियों की कुल नेट वर्थ से भी ज्यादा है.

प्राइवेट कोचिंग कंपनी इतनी बड़ी कैसे हो गई?

अब आप खुद सोचिए कि जिस देश में 15 लाख सरकारी और प्राइवेट स्कूल हैं, एक हजार यूनिवर्सिटीज हैं और 33 हजार से ज्यादा प्ले स्कूल हैं, वहां प्राइवेट कोचिंग देने वाली एक कंपनी इतनी बड़ी हो गई कि उसने कई दूसरी बड़ी कंपनियों को भी पीछे छोड़ दिया. इसलिए आज ये समझना जरूरी है कि जहां भारत में कैसे ट्यूशन का ये उद्योग इतना विशाल हो गया है और भारत में शिक्षा वाली संस्कृति कैसे कोचिंग वाले कल्चर में बदल गई है.

कोचिंग कल्चर में बदली शिक्षा वाली संस्कृति 

वर्ष 1947 में जब भारत को आजादी मिली, तब हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था काफी कमजोर थी. हालांकि धीरे-धीरे इसमें बदलाव शुरू हुए लेकिन 90 के दशक तक शिक्षा का एक ही केंद्र  होता था और वो था स्कूल. हम स्कूल को शिक्षा का मंदिर कहते थे. उस समय छात्र स्कूल से घर लौटने के बाद अपना होम वर्क पूरा करते थे और जो बच्चे इसके लिए किसी की मदद लेते या किसी से कोचिंग लेते थे तो समाज में इसे अच्छा नहीं माना जाता था.

ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षकों को भी समाज में उतना सम्मान नहीं मिलता था. ऐसे लोगों को उस समय शिक्षक नहीं, कारोबारी कहा जाता था क्योंकि, वो प्राइवेट कोचिंग देकर बच्चों के माता-पिता से पैसे कमाते थे, लेकिन आज तस्वीर बदल गई है. आज स्कूल वाली शिक्षा व्यवस्था के समानांतर ट्यूशन वाली एक व्यवस्था खड़ी हो गई है.

आज जब आप अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं तो उनसे कहते हैं कि समय से घर पहुंच जाना क्योंकि, उन्हें स्कूल के बाद ट्यूशन भी जाना है.

4 साल की छोटी उम्र से ही ट्यूशन पढ़ने का बोझ 

एक स्टडी के मुताबिक, भारत में बच्चे 4 साल की छोटी उम्र से ही पढ़ाई के लिए ट्यूशंस लेनी शुरू कर देते हैं. यानी बचपन से ही बच्चों के दिमाग में ट्यूशन वाला फॉर्मूला बैठा दिया जाता है और उन्हें बता दिया जाता है कि अगर उन्होंने ट्यूशन नहीं ली तो वो दूसरे बच्चों से पीछे रह जाएंगे और उन्हें फिर कोई नहीं पूछेगा.

एक सब्जेक्ट की ट्यूशन के लिए मोटी फीस 

आज 8वीं कक्षा तक पहुंचते पहुंचते बच्चों को ट्यूशन की एक लत लगा दी जाती है और यहीं से इस उद्योग का विस्तार शुरू होता है. 8वीं कक्षा के बाद बच्चे अलग अलग सब्जेक्ट्स की ट्यूशन लेनी शुरू कर देते हैं. भारत में औसतन एक सब्जेक्ट को पढ़ाने के लिए महीने की फीस 400 रुपये है और कई मामलों में ये 1 हजार रुपये से भी ज्यादा हो जाती है.

कुल कमाई का 12 प्रतिशत हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं पैरेंट्स 

पहले आप स्कूल की फीस भरते हैं, फिर ट्यूशन की फीस भरते हैं और इस तरह अपनी कुल कमाई का 12 प्रतिशत हिस्सा अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर देते हैं और जब बच्चे स्कूल की पढ़ाई पूरी करके अच्छे मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेने के लिए जाते हैं, तो उन्हें इसके लिए भी कोचिंग लेनी पड़ती है.

इसके अलावा IAS और IPS बनने के लिए भी कोचिंग ली जाती है और एक कड़वा सच तो ये है कि आज अगर आपको किसी सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी भी पानी है तो उसकी परीक्षा को पास करने के लिए भी ट्यूशन लेनी पड़ती है.

ट्यूशन वाली पढ़ाई ज्यादा ताकतवर हो गई

मतलब आज अगर आप अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते हैं, किसी अच्छे कॉलेज में उसका दाखिला कराते हैं, लेकिन उसे ट्यूशन क्लासेज नहीं दिलवाते तो जीवन में उसके लिए ये पढ़ाई एक सर्टिफिकेट से ज्यादा कुछ नहीं है. यानी आज ट्यूशन वाली पढ़ाई, स्कूल और कॉलेजों वाली पढ़ाई से भी ज्यादा ताकतवर हो गई है और ये ताकत कई कंपनियों के लिए नोट छापने की एक मशीन जैसी है, जिसे आप कुछ आंकड़ों से भी समझ सकते हैं.

-भारत में हर चार में से एक बच्चा पढ़ाई के लिए अपने स्कूल से ज्यादा ट्यूशंस पर निर्भर है. हमारे देश में लगभग 7 करोड़ बच्चे प्राइवेट ट्यूशंस लेते हैं.

-एक हफ्ते में एक बच्चा अपने 9 घंटे ट्यूशन क्लासेज लेने में ही बिता देता है. सरल शब्दों में कहें तो ये समय डेढ़ दिन स्कूल में रहने के बराबर है.

-भारत के जिस राज्य में बच्चे सबसे ज्यादा प्राइवेट ट्यूशन लेते हैं, उनमें पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर है. यहां सेकेंड्री और हायर सेकेंड्री यानी 9वीं से 12वीं तक के 89 प्रतिशत छात्र ट्यूशन पढ़ते हैं. पश्चिम बंगाल में इस समय चुनाव चल रहे हैं. ऐसे में इन आंकड़ों से आप वहां की शिक्षा व्यवस्था का भी अंदाजा लगा सकते हैं क्योंकि, ये मुद्दा वहां चुनाव से पूरी तरह गायब है. 

-हालांकि दूसरे राज्यों की स्थिति भी इस मामले में ज्यादा अच्छी नहीं है. त्रिपुरा में 87 प्रतिशत, बिहार में 67.2 प्रतिशत, ओडिशा में 63.4 प्रतिशत और मणिपुर में 54.7 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन लेते हैं.

-एक सर्वे में जब कुछ बच्चों से ये पूछा गया कि वो स्कूल से घर लौटने के बाद ट्यूशन क्यों पढ़ते हैं तो उनका जवाब था कि स्कूल में उनके डाउट्स कभी क्लियर नहीं होते और इसी वजह से उन्हें ट्यूशन लेनी पड़ती. यानी ये हमारे सिस्टम का भी एक बड़ा फेलियर है.

-यहां हम आपसे एक और बात कहना चाहते हैं और वो ये कि आज अगर हमारे देश में किसी बच्चे से ये पूछा जाए कि अच्छे शिक्षक कहां मिलते हैं. वो स्कूल में मिलते हैं या ट्यूशन में मिलते हैं, तो जवाब यही होगा कि ट्यूशन में मिलते हैं.

-इस तरह के ट्यूशन में हर बच्चे पर ध्यान दिया जाता है और इसके बदले उनसे अच्छे पैसे भी लिए जाते हैं और माता-पिता भी खुशी खुशी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए ये खर्च उठा लेते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करना ही क्यों पड़ता है. इसे भी आज आप समझिए.

-आदर्श स्थिति में भारत के स्कूलों में एक कक्षा में 30 बच्चों को एक साथ पढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन पढ़ाया जाता है औसतन 60 बच्चों को यानी कक्षा में एक शिक्षक एक समय में 60 बच्चों को किसी विषय की पढ़ाई कराता है. ऐसे में ज्यादातर बच्चों को ऐसा लगता है कि वो भीड़ में कुछ समझ नहीं पाए और उनके डाउट्स क्लियर नहीं हुए और इसीलिए वो ट्यूशन लगवा लेते हैं क्योंकि, ट्यूशन में हर एक बच्चे की पढ़ाई पर अच्छे से ध्यान देने का वादा किया जाता है.

स्कूलों में शिक्षकों की कमी 

मतलब अगर स्कूलों में ही बच्चों को सारी बातें समझ आ जाएं और उन्हें सभी विषयों का सही ज्ञान हो जाए तो उन्हें ट्यूशन पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. हालांकि इसका एक और कारण है और वो ये कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है. सितंबर 2020 में लोक सभा में ये जानकारी दी गई थी कि भारत के सरकारी स्कूलों में इस समय 17 प्रतिशत शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं. ये संख्या 10 लाख 6 हजार होती है.

ट्यूशन सेंटर्स बेहतर विकल्प कैसे

सोचिए शिक्षकों की इतनी नौकरियां खाली पड़ी हैं, लेकिन आज जो लोग बीएड की पढ़ाई करते हैं, वो स्कूलों में पढ़ाने से बेहतर इन ट्यूशन सेंटर्स को बेहतर विकल्प मानते हैं और इसकी वजह है यहां मिलने वाला ज्यादा वेतन.

आज हमारे देश में ट्यूशन का उद्योग सालाना 25 हजार करोड़ रुपये का हो चुका है और पिछले 5 वर्षों में इसमें 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. मतलब स्कूल से बच्चे ट्यूशन की तरफ ज्यादा रुख कर रहे हैं. हालांकि अभी तक हमने आपको जो भी खर्च बताया, वो स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों से जुड़ा है.

अगर 12वीं की कक्षा के बाद कोई छात्र मेडिकल या इंजीनियरिंग के एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी करना चाहता है, तो इसके लिए उसे सालाना लगभग डेढ़ लाख रुपये ख़र्च करने पड़ते हैं और अगर वो दो साल तक किसी कोचिंग सेंटर में रह कर इसकी तैयारी करता है तो इसका खर्च 3 लाख रुपये से ऊपर चला जाता है.

बदलती हुई व्यवस्था

आपने ऐसी कई कहानियां सुनी होंगी, जिनमें एक मिडल क्लास परिवार अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन या घर गिरवी रख देता है या फिर उसे बेच देता है. ये कहानियां आप सुनते होंगे, लेकिन आज हम आपसे कहना चाहते हैं कि ये कहानियां सच्ची होती हैं. भारत में प्राइवेट शिक्षा का खर्च इतना ज्यादा है कि कई परिवार कंगाल हो जाते हैं और इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारे देश के लिए कुछ और नहीं हो सकता.

इस बदलती हुई व्यवस्था को आप दो बातों से भी समझ सकते हैं. एक दौर वो था जब माता पिता इसलिए शादी या किसी दूसरे कार्यक्रम में नहीं जाते थे क्योंकि, इससे बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती थी. लेकिन आज जमाना बदल गया है. आज के बहुत से माता -पिता अपने करीबी रिश्तेदारों के यहां कार्यक्रमों में या शादियों में सिर्फ इसलिए नहीं जा पाते क्योंकि, उनकी छुट्टी वाले दिन भी उनके बच्चों की ट्यूशन क्लास होती है. 

अच्छी शिक्षा हासिल करने का सॉल्यूशन

हकीकत तो ये है कि आज हमारे देश में ज्यादातर लोगों ने ट्यूशन को ही अच्छी शिक्षा हासिल करने का एकमात्र सॉल्यूशन मान लिया है.  कोचिंग वाली मानसिकता वहां से शुरू होती है, जहां से प्रतियोगिता में पिछड़ जाने का डर शुरू होता है. स्कूलों में जब शिक्षक केवल परीक्षा पास करने जितना पढ़ाते हैं. तब प्राइवेट कोचिंग के बाहर खड़े ये मार्केटिंग एग्जक्यूटिव सवालों में उलझे विद्यार्थियों को कोचिंग की माया का असली ज्ञान देते हैं.

दिल्ली का लक्ष्मी नगर ऐसा ही एक क्षेत्र जहां कोचिंग के बहुत सारे इंस्टीट्यूट हैं. हर कोचिंग इंस्टीट्यूट की अलग-अलग फीस है और यहां पर हर शिक्षक का अलग-अलग रेट है. हालांकि मकसद एक ही है कि यहां आए बच्चे को पढ़ाना है, लेकिन सवाल ये है कि स्कूल, कॉलेज में पढ़ाई कर रहे बच्चों को आखिर कोचिंग की जरूरत पड़ती ही क्यों है.

कोचिंग आने वाले बच्चों का मानना है कि सेल्फ स्टडी की जा सकती है, लेकिन स्कूल, कॉलेज में शिक्षक सवालों पर उलझने पर डाउट क्लीयर नहीं करते और कई बार किताबी भाषा उन्हें समझने में भी दिक्कत आती है, जिसकी वह से उन्हें कोचिंग इंस्टीट्यूट आना पड़ता है.

प्रतियोगी परीक्षाओं पर कोचिंग इंस्टीट्यूट के दावे

कोचिंग की फीस भरने में सक्षम परिवार अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ने नहीं देना चाहते हैं. इसी वजह से कोचिंग इंस्टीट्यूट के दावों के फेर में फंसते हैं, जबकि सच्चाई ये है कि भले ही कोचिंग इंस्टीट्यूट में कई बच्चे पढ़ते हों लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी की टॉप रैकिंग आती हो, लेकिन फिर भी बच्चों का मानना है कि अच्छे टीचर स्कूल, कॉलेज में नहीं, कोचिंग इंस्टीट्यूट होते हैं. कोचिंग इंस्टीट्यूट के शिक्षक भी ऐसा मानते हैं.

दरअसल, स्टूडेंट की एक सोच ये भी है कि स्कूल, कॉलेज में पढ़ाने वाले शिक्षकों को सैलरी मिलती है चाहे वो कैसे भी कितने भी दिन पढ़ाएं और उन पर परीक्षा पास कराने की बंदिश नहीं होती, लेकिन कोचिंग इंस्टीट्यूट के ऊपर खास परीक्षा पास करवाने की जिम्मेदारी होती है और उसी बात के लिए वो फीस चार्ज करते हैं.

कभी ट्यूशन पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को कमजोर माना जाता था 

1960 में एक वक्त था जब शिक्षा के मामले में ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों को कमजोर माना जाता था. मान्यता था कि जो बच्चा स्कूल के अलावा ट्यूशन भी जाता है, वो पढ़ाई में कमजोर हैं, लेकिन धीरे धीरे ये मानसिक एक बड़े बिजनेस में बदल गई. लोगों के अंदर ये भावना है कि अगर दूसरे के बच्चे को प्राइवेट कोचिंग मिल रही है तो मेरे बच्चे को क्यों नहीं और इसी सोच से निजी स्कूल और कोचिंग का बिजनेस बढ़ा है.

देश में शिक्षा को लेकर जागरुकता तो आई है, लेकिन शिक्षकों की स्थिति में बदलाव नहीं आया है. शिक्षकों के लाखों पद खाली हैं. ज्यादातर स्कूलों में संविदा वाले शिक्षकों को रखा जा रहा है. जिनके ज्ञान पर कई बार सवाल उठते हैं. प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर सरकारी व्यवस्था में सुधार पर चर्चा कभी नहीं होती. नई शिक्षा नीति कौशल विकास पर ध्यान देती है, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करने के लिए जिस तरह की शिक्षा की आवश्यकता है, वो नहीं मिल पाती.

समझिए ट्यूशन उद्योग का फॉर्मूला 

आज हमने आपके लिए कुछ दिलचस्प विज्ञापन भी निकाले हैं, जिससे आप ट्यूशन उद्योग का फॉर्मूला समझ जाएंगे. आपने इस तरह की कई स्कीम सुनी होंगी, जिनमें 25 दिन में पैसा डबल करने के दावे किए जाते हैं और यही फॉर्मूला कुछ ट्यूशन सेंटर्स भी इस्तेमाल करते हैं. हम ऐसा नहीं कह रहे कि सभी ऐसा करते हैं, लेकिन कुछ ट्यूशन सेंटर्स ऐसा करते हैं. ये ऐसे विज्ञापन भी देते हैं कि हम एक रिक्शा चालक को भी फिजिक्स सिखा सकते हैं. इन विज्ञापनों के जरिए ही बच्चे और उनके माता-पिता ट्यूशन की तरफ खींचे चले आते हैं और ये व्यापार करोड़ों रुपये का बन जाता है.

विदेशों में भी लोकप्रिय हो रहा कोचिंग कल्चर

हालांकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में ही कोचिंग वाला कल्चर लोकप्रिय हो रहा है. ग्लोबल एजुकेशन सेंसस के मुताबिक, जापान में 70 प्रतिशत, मलेशिया में 83 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया में 92.8 प्रतिशत छात्र स्कूल के अलावा प्राइवेट ट्यूशंस की भी मदद लेते हैं. यानी ये समस्या सिर्फ भारत में नहीं बल्कि कई देशों में प्राइवेट ट्यूशन का उद्योग बड़ा आकार ले चुका है और वर्ष 2022 तक ये 227 अरब डॉलर यानी साढ़े 16 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा.

शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत

इस समस्या की एक ही समाधान है और वो ये कि जब तक हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव नहीं करेंगे, स्कूलों में शिक्षा का स्तर बेहतर नहीं करेंगे, छात्रों को प्रोत्साहित नहीं करेंगे और स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की गुणवत्ता में सुधार नहीं करेंगे, टैलेंट की कद्र नहीं करेंगे, तब तक शिक्षा वाली संस्कृति पर कोचिंग वाला कल्चर हावी रहेगा.





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