July 25, 2021

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विशेष संयोगों में होगी चैत्र नवरात्रि की शुरुआत, भक्तों पर बरसेगी मां दुर्गा की कृपा


Jaipur: चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) कल से शुरू होकर 21 अप्रैल रामनवमी (Ramnavmi) तक चलेगी. इस बार भारती, हर्ष, सर्वार्थसिद्धि और अमृतसिद्धि योग में नवरात्रि की शुरुआत हो रही है. इन शुभ योगों में शक्ति पर्व शुरू होने से देवी पूजा आराधना से मिलने वाला शुभ फल और बढ़ जाएगा. 

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13 अप्रैल को स्वयं सिद्ध मुहूर्त रहेगा. जब नवरात्रि शुरू होंगे, तब इसी दिन से हिंदुओं का नया साल यानि नवसंवत्सर 2078 शुरू होगा जिसका नाम आनंद है. पंचांग के मुताबिक, ये हिंदू नववर्ष का पहला दिन रहेगा.

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सर्वार्थसिद्धि और अमृतसिद्धि योग में नवसंवत्सर 2078 की शुरूआत मंगलवार से होगी. सुबह सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त में 6.09 से लेकर 6.12 बजे तक मंदिरों से लेकर घरों में घट स्थापना होगी. इसके बाद द्विस्वभाव लग्न में स्थापना की जा सकेगी. मां का आगमन घोड़े पर होगा, जो कि कई मायनों में शुभता प्रदान करने वाला होगा. घरों में ध्वजाएं लगाई जाएंगी, मंदिरों में भी विभिन्न कार्यक्रम होंगे. 

शिला माता मंदिर में दर्शन नहीं कर सकेंगे भक्त 
घंटे घड़ियालों के बीच नव सवंत्ससर का स्वागत किया जाएगा. शहर में इस बार बड़े स्तर पर सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं होंगे. वहीं, भक्त व्रत रखकर शक्ति की आराधना में नौ दिनों तक लीन रहेंगे. वहीं, कोरोना के चलते इस बार आमेर स्थित शिला माता मंदिर में भक्त दर्शन नहीं कर सकेंगे. दुर्गापुरा, झालाना सहित अन्य माता के मंदिरों में कुछ दूरी से कोरोना के दिशानिर्देशों की पालना के साथ भक्त दर्शन  करेंगे. 

शासकों के लिए रहेगी उथल-पुथल की स्थिति 
ज्योतिषाचार्य पुरषोत्तम गौड़ के मुताबिक, इस बार चैत्र नवरात्रि मंगलवार को शुरू होगी, जिसकी वजह से मां घोड़े पर सवार होकर आएंगी. इससे पहले शारदीय नवरात्रि पर भी मां घोड़े पर सवार होकर आई थीं. देवी मां जब भी घोड़े पर आती हैं, तो युद्ध की आशंका बढ़ जाती है. साथ ही शासन सत्ताधारी और शासकों के लिए उथल-पुथल की स्थिति और परिवर्तन के योग कारक होंगे. प्रतिपदा तिथि पर कलश स्थापना के साथ ही नवरात्रि पर्व की शुरुआत होगी. घट स्थापना करते हुए भगवान गणेश की वंदना के साथ माता शैल पुत्री की पूजा, आरती की जाती है.

देवी के इन नौ स्वरूपों की होगी आराधना
13 अप्रैल को प्रतिपदा- मां शैलपुत्री की पूजा और घटस्थापना
14 अप्रैल को द्वितीया- मां ब्रह्मचारिणी पूजा
15 अप्रैल को तृतीया- मां चंद्रघंटा पूजा
16 अप्रैल को चतुर्थी- मां कुष्मांडा पूजा
17 अप्रैल को पंचमी- मां स्कंदमाता पूजा
18 अप्रैल को षष्ठी- मां कात्यायनी पूजा
19 अप्रैल को सप्तमी- मां कालरात्रि पूजा
20 अप्रैल को अष्टमी- मां महागौरी
21 अप्रैल को रामनवमी- मां सिद्धिदात्री
22 अप्रैल को दशमी- नवरात्रि पारण

मां की पूजा के शुभ मुहूर्त
मिथुन लग्न में सुबह 9.46 से दोपहर 12 बजे तक रहेगा. अभिजीत समय में भी घटस्थापना की जा सकती है, जो दोपहर 12 से 12.52 तक रहेगा. आमेर स्थित शिला माता मंदिर में नवरात्रि स्थापना 6.10 बजे होगी. निशा पूजन सप्तमी तिथि सोमवार 19 अप्रैल को रात 10 बजे होगा. वहीं मंगलवार अष्टमी 20 अप्रैल को हवन की पूर्णाहुति शाम 4.30 बजे होगी. वहीं 22 अप्रैल को सुबह 10.30 बजे नवरात्रा उत्थापना होगी.

कोरोना गाइड लाइन का होगा पालन
उधर सिंधी समाज के आराध्य वरुणावतार भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव चेटीचंड का पर्व मंगलवार को रहेगा. इसके साथ ही संत कंवर राम की जयंती भी आयोजित की जाएगी. इस मौके पर शहर में झूलेलाल के मंदिरों में कोरोना के दिशा-निर्देशों की पालना के साथ सीमित संख्या में कार्यक्रम होंगे. शोभायात्रा नहीं निकाली जाएगी. लेखक वासुदेव सिंधु भारती ने बताया कि भगवान  झूलेलाल ने सिंध की प्रजा को मिरखशाह के जुल्मों से मुक्ति दिलाने के लिए अवतार लिया. 

इसी लिए सिंधी समुदाय भगवान झूलेलाल के जन्मोत्सव को चेटीचंड के रूप में मनाता है. भगवान झूलेलाल के विग्रह को पंचामृत अभिषेक करा कर नवीन वस्त्र धारण कराए जाएंगे. लाल रंग की धर्मध्वजा फहराई जाएगी. मंदिरों में ज्योति प्रज्ज्वलित की जाएगी. वेदोक्त मंत्रों से हवन किया जाएगा. भगवान को मीठे चावल, छोले और शरबत का भोग लगेगा. इसके साथ ही कोरेाना से मुक्ति के लिए और देश में सुख समृद्धि के लिए पल्लव प्रार्थना की जाएगी. अमरापुर दरबार के मंडलाध्यक्ष स्वामी भगत प्रकाश के आनलाइन आर्शीवचन होंगे. वहीं भगवान झूलेलाल और साईं कंवर राम साहिब का जन्मोत्सव पूरे विश्व में मनाया जाएगा.

नवरात्रि में कई गुना हो जाता है पूजा का फल 
नवरात्रि पर देवी दुर्गा पृथ्वी पर आती हैं. यहां वे नौ दिनों तक वास करते हुए भक्तों की साधना से प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं. नवरात्रि पर देवी दुर्गा की साधना और पूजा-पाठ करने से आम दिनों के मुकाबले पूजा का कई गुना ज्यादा फल की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि भगवान राम ने भी लंका पर चढ़ाई करने से पहले रावण से युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए देवी की साधना की थी. 

 





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