जब पुलिस बन गई थी ‘हैवान’, 11 तीर्थ यात्रियों को बस से उतारकर कर दिया था गोलियों से छलनी; जानिए क्या है किस्सा


देवेंद्र कुमार, लखनऊ: यूपी के गोरखपुर में प्रॉपर्टी डीलर मनीष गुप्ता (Gorakhpur Manish Gupta Murder Case) की पुलिस कस्टडी में संदिग्ध मौत के बाद देश में पुलिसिया उत्पीड़न का मामला गर्म है. लोग कारोबारी मनीष गुप्ता के हत्यारे पुलिसकर्मियों को कड़ी सजा देने की मांग कर रहे हैं. 

घटना पढ़कर कांप उठेंगे आप

पुलिस के उत्पीड़न का यह कोई पहला या आखिरी किस्सा नहीं है. आज हम आपको एक ऐसा सच्चा किस्सा बताने जा रहे हैं, जिसमें 7 थानों के दर्जनों पुलिसवालों ने ‘गिरोह के बदमाशों’ की तरह काम करते हुए 11 सिख तीर्थ यात्रियों को गोलियों से भून दिया था. इस फर्जी मुठभेड़ में शामिल अधिकतर थानेदार सब-इंस्पेक्टर थे, जिन्होंने एनकाउंटर (Fake Police Encounter) के बाद आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाने की चाह में इस खूनी कांड को अंजाम दिया था. इस घटना के 25 साल बाद पीड़ितों को इंसाफ तो मिला लेकिन उनके जो परिजन हमेशा के लिए बिछड़ गए थे, उन्हें वे आज तक भूल नहीं पाए हैं. 

तीर्थ यात्रा से लौट रहे थे 25 सिख

12 जुलाई 1991 को 25 सिख तीर्थयात्रियों का जत्था पटना साहिब, हुज़ूर साहिब और और नानकमत्ता साहिब के दर्शन करके वापस उत्तराखंड (तब यूपी) के सितारगंज लौट रहा था. तभी पीलीभीत (Pilibhit Fake Encounter Case) से पहले बिलसंडा में करीब 7 थानों के 60-70 पुलिस वालों ने सुबह 11 बजे उनकी बस को घेर लिया. बस में उस वक्त 13 पुरुष, 3 बच्चे और 9 महिलाएं सवार थीं. पुलिस वालों ने महिलाओं-बच्चों और 2 बुजुर्गों को छोड़ दिया, जबकि बाकी 11 पुरुषों को वे अपने साथ ले गए. 

जंगलों में ले जाकर 11 लोगों को मार दिया 

यह वह दौर था, जब पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद का जोर था और देश में कई जगहों पर आतंकी घटनाएं हो रही थीं. पुलिस ने बस से उतारे गए एक यात्री तलविंदर सिंह को मार कर नदी में बहा दिया, जिसकी आज तक लाश भी नहीं मिली है. बाकी बचे 10 सिख यात्रियों को पुलिस वाले (UP Police) दिनभर अपनी बस में इधर-उधर घुमाते रहे. इस दौरान थानेदार अपने सीनियर अफसरों के संपर्कों में बने हुए थे और उनसे निर्देश ले रहे थे. रात होने पर उन 10 तीर्थ यात्रियों के हाथ पीछे बांधकर तीन टोलियों में बांट दिया गया. दो टोली में चार-चार सिख और एक में दो सिख रखे गए. इसके बाद सभी को पीलीभीत के अलग-अलग जंगलों में ले जाकर गोली मार (Pilibhit Fake Encounter Case) दी गई.

मुठभेड़ में 10 आतंकियों के मारे जाने का दावा

अगले दिन पुलिसवालों ने जोर-शोर से ऐलान किया तीन अलग-जगहों पर हुई मुठभेड़ों में खालिस्तान लिबरेशन आर्मी और खालिस्तान कमांडो फोर्स के 10 आतंकवादियों को मार (Pilibhit Fake Encounter Case) गिराया गया है. पुलिस ने उनके पास से कई हथियारों की बरामदगी का भी दावा किया. जब यह बात अखबारों में आई तो मारे गए यात्रियों के परिवार वालों ने हंगामा कर दिया. परिवार वालों ने कहा कि मारे गए लोग आतंकी नहीं तीर्थ यात्री थे. पुलिस वालों ने उन्हें बस से उतारकर अलग-अलग जगह ले जाकर मारा है. इस घटना से उस वक्त यूपी की राजनीति में भूचाल आ गया. मीडिया में सुर्खियां बनने के साथ ही विपक्षी दलों ने भी इसे बड़ा मुद्दा बना लिया. 

सीबीआई की जांच में फर्जी निकली मुठभेड़

5 मई, 1992 को सीनियर वकील आरएस सोढ़ी की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच CBI को सौंप दी. सीबीआई की जांच में जिले के कई थानेदारों, सब-इंस्पेक्टरों और सिपाहियों के नाम इस घटना में सामने आए. जांच से पता चला है पुलिस की एनकाउंटर थ्योरी पूरी तरह फर्जी थी. मरने वालों के पोस्टपार्टम में उनके शरीर पर चोट के तमाम निशान थे. सीबीआई ने उस बस की जांच की, जिसमें उन्हें ले जाया गया था तो उसमें भी गोलियों के निशान मिले. हालांकि पुलिसवालों ने गोलियों के निशान मिटाने के लिए बस को डेंट-पेंट कर दिया गया था.

नकद इनाम और प्रमोशन के लिए हत्या

11 सिख यात्रियों को मारने वाले पुलिसकर्मियों ने कागजों में इस फर्जी मुठभेड़ में पीएसी को भी शामिल दिखाया था. जबकि जांच में पता चला कि घटना के वक्त पीएसी अपने कैंप में थी और उसका इस घटना से कोई लेना-देना नहीं था. सीबीआई की जांच में पता चला कि पुलिस ने आतंकियों को मारने पर मिलने वाला इनाम हासिल करने और आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाने के लालच में 11 बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. इन्वेस्टिगेशन में यह भी सामने आया कि पुलिस ने घरवालों को मारे गए लोगों की लाश तक नहीं दी थी और गुपचुप रूप से खुद ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया था. 

25 साल बाद आया फैसला, 47 को उम्र कैद

CBI ने इस पीलीभीत फर्जी मुठभेड़ कांड (Pilibhit Fake Encounter Case) के रूप में चर्चित इस केस में 178 गवाह बनाए और 101 दूसरी चीजें सबूत के तौर पर पेश किए. एजेंसी ने इस मामले में कुल 57 पुलिसकर्मियों के खिलाफ सीबीआई की लखनऊ कोर्ट के सामने चार्जशीट पेश की. उस वक्त तक 10 पुलिसवाले मर चुके थे, इसलिए बाकी 47 पुलिसवालों के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा चलाया गया. करीब 25 साल तक चले मुकदमे के बाद कोर्ट ने 5 अप्रैल 2016 को इस मामले में फैसला सुनाया. अदालत ने आरोपी सभी 47 पुलिसवालों को दोषी ठहराते हुए उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी. 

बड़े पुलिस अफसरों को सीबीआई ने बचाया?

हर बार की तरह इस घटना के असली गुनाहगार सीनियर आईपीएस और पीपीएस अफसर साफ बच गए. कोर्ट ने सजा सुनाते हुए इस मुद्दे पर कड़वी टिप्पणी भी की, ‘जिस तरह 11 सिख पुरुषों को तीन हिस्सों में बांटकर उनकी अलग-अलग क्षेत्रों में हत्या की गई. उससे यह साबित होता है कि आरोपी पुलिसवालों को जिला स्तर के महत्वपूर्ण अधिकारी निर्देश दे रहे थे. उन्हीं के निर्देश पर ये हत्याएं की गईं, लेकिन सीबीआई ने अपनी जांच से उन्हें दूर रखा.’ कोर्ट ने सरकार से खाकी वर्दी पहने उन बड़े अफसरों के खिलाफ एक्शन के लिए कहा लेकिन आज तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है. 

एनकाउंटर पॉलिसी पर उठे सवाल 

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए एनकाउंटर पॉलिसी पर भी सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा, ‘जब तक प्रमोशन का आधार एनकाउंटर बने रहेंगे, पुलिस वाले निरीह लोगों की हत्याएं करते रहेंगे. एनकाउंटर (Pilibhit Fake Encounter Case) पर एसआई को इंस्पेक्टर बना दिया जाता है तो इंस्पेक्टर को डिप्टी एसपी. प्रमोशन का यही लालच पुलिसवालों को फर्जी एनकाउंटर के लिए प्रेरित करता है. इन्हें रोकने के लिए प्रमोशन को एनकाउंटर से अलग करना होगा.’

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पहचान के लड़के का भी किया मर्डर

पीलीभीत में 11 सिख तीर्थ यात्रियों की सामूहिक हत्या (Pilibhit Fake Encounter Case) को अब 30 साल गुजर चुके हैं लेकिन पीलीभीत के जगत गांव में रहने वाले लोग इस बात को भूल नहीं पाए हैं. उन्हीं पीड़ितों में से एक सरदार बलकार सिंह के छोटे भाई लखविंदर सिंह की भी पुलिस ने हत्या कर दी थी. बलकार सिंह कहते हैं कि लखविंदर स्कूल से आकर उनकी दुकान पर बैठता था. इलाके का थानेदार भी हमारी दुकान पर आता था. वह लखविंदर को पहचानता था. उस दिन तीर्थ यात्रियों वाली बस में वह भी सवार था. इसके बावजूद उसे इसलिए गोली मार दी गई कि अगर उसे छोड़ दिया तो वह कहीं थानेदार के खिलाफ गवाही न दे दे. 

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