Durga Navratra Puja: कैसे हुई श्रीदुर्गा सप्तशती की रचना, जानिए इससे जुड़ा ये सच


 Buxar: Durga Navratra Puja: नवरात्र का पर्व जोर-शोर से मनाया जा रहा है. इस दौरान भक्त, भक्ति में डूबे हुए मंदिरों में पहुंच रहे हैं. बिहार का बक्सर जिला प्राचीन नगरी है और पौराणिक काल से कई कथाओं को खुद में समेटे हुए है. इन प्राचीन कथाओं में सबसे दिलचस्प कथा है श्रीदुर्गा सप्तशती (Shree Durga Saptsahti) के रचे जाने की, जो यहीं पर स्थित महर्षि मेधा के आश्रम से दुनिया भर में फैली और अपने ज्ञान से प्रकाशित किया.

राजा को मिली शांति
इस कथा में राजा सुरथ और समाधि वैश्य का नाम आता है. युद्ध में हारकर राजा सुरथ और परिवार से तिरस्कृत होकर समाधि वैश्य वन में भटक रहे थे. दोनों जंगल में मिले तो साथ चलते-चलते महर्षि मेधा के आश्रम में पहुंचे. यहां ऋषि अपने शिष्यों को सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में आख्यान दे रहे थे. राजन को उनके उपदेश सुनकर शांति मिली.

दोनों ऋषि मेधा के शरण में पहुंचे
इसके बाद दोनों ही महर्षि मेधा की शरण में पहुंचे और उन्हें अपना गुरु मान लिया. इसके साथ ही सृष्टि की सूक्ष्म शक्ति और ब्रह्मांड के रहस्यों के बारे में पूछा. महर्षि मेघा ने उन्हें समझाया कि मन शक्ति के आधीन होता है,और आदि शक्ति के अविद्या और विद्या दो रूप हैं, विद्या ज्ञान स्वरूप है और अविद्या अज्ञान स्वरूप. जो व्यक्ति अविद्या (अज्ञान) के रूप में उपासना करते है, उन्हें वे विद्या स्वरूपा प्राप्त होकर मोक्ष प्रदान करती हैं.

इतना सुन राजा सुरथ ने प्रश्न किया- हे महर्षि ! देवी कौन है? उसका जन्म कैसे हुआ? वह कहां मिलेंगी? उनके महात्म्य के विषय में बताइए. हम उन्हें कैसे पुकारें?

महर्षि मेधा ने बताया देवी का स्वरूप
राजन ने एक स्वर में उत्सुकता वश सारे प्रश्न कर लिए. महर्षि बोले- आप जिस देवी के विषय में पूछ रहे हैं, वह नित्य स्वरूपा और विश्वव्यापिनी हैं. वह आदि शक्ति हैं. उन्हें परमा की संज्ञा भी प्राप्त है. वह आपके ईष्ट क्षीरसागर में शयन करने वाले पालक विष्णु की योगमाया शक्ति भी हैं और उनकी योगनिद्रा भी हैं.

ऋषि ने सुनाई देवी के प्राकट्य की कथा
श्रीहरि के कर्णमैल से उत्पन्न मधु-कैटभ का अंत भी योगमाया की कृपा से हुआ. वह सदैव उनके नयनों में निवास करके संसार को देखती हैं. उनका प्राकट्य हुआ, जन्म नहीं. वह अनादि हैं और अनंत भी. यह सत्य है कि वह संसार के कल्याण के लिए जन्म लेती रही हैं. फिर भी वह आदि स्वरूपा हैं.

ऋषि ने विस्तार से देवी का प्राकट्य सुनाना शुरू किया. एक समय देवराज इंद्र और दैत्य महिषासुर में सैकड़ों वर्षों तक घनघोर संग्राम हुआ, इस युद्ध में देवराज इन्द्र की पराजय हुई और महिषासुर इन्द्रलोक का स्वामी बन बैठा. उसे ब्रह्माजी से वरदान था कि उसका काल एक स्त्री होगी. इसके बाद सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों को आह्वान करके उसे स्त्री रूप दिया और अपने शस्त्रों से उन्हें सज्ज किया. देवताओं ने दुखी स्वर में उनसे प्रार्थना की और रक्षा का वचन लिया.

देवी ने किया महिषासुर का वध
इसके बाद देवी ने महिषासुर को ललकारा और उसका वध कर दिया. इन्हीं देवी ने शुम्भ और निशुम्भ राक्षसों का वध गौरी देवी के स्वरूप में किया. फिर उन्होंने चंड-मुंड और रक्तबीज का भी संहार कर देवताओं को अभय दिया. इसके बाद महर्षि ने देवी के सूक्ष्म स्वरूप की व्याख्या की. दस महाविद्या का वर्णन किया और नवदुर्गा की व्याख्या की. देवी का ऐसा वर्णन सुनकर राजा सुरथ और समाधि वैश्य वहीं नदी किनारे देवी की तपस्या की. देवी मां ने प्रकट होकर उन्हें विजयी होने का आशीष दिया देवी के प्रताप से समाधि वैश्य संसार के मोह से मुक्त होकर आत्मचिंतन में लग गया. राजा सुरथ ने शत्रुओं पर आक्रमण करके विजय प्राप्त करके अपना वैभव प्राप्त कर लिया.

दोनों ही भक्तों की यही कथा श्री दुर्गा सप्तशती का आधार बनी. देवी के सबसे प्रथम कृपा पात्रों के रूप में यह दोनों भक्त चिरकाल तक अमर हैं. श्रीदुर्गा सप्तशती के रूप में इनकी कथा देवी भागवत का महात्म्य बताती रहेगी.

 



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