किसान नेताओं का 6 मांगों वाला छल! अब न्यूनतम मूल्य पर होगी अधिकतम राजनीति?


नई दिल्ली: प्रधानमंत्री मोदी की ओर से कृषि कानून वापस लिए जाने के बावजूद किसान नेता अपना आंदोलन समाप्त करने के लिए तैयार नहीं हैं. संयुक्त किसान मोर्चा नाम के किसान संगठन ने अब प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने 6 शर्तें और लगा दी, जिसमें सबसे ऊपर है MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर कानून बनाने की मांग. आज हम आपको इस MSP नाम के जिन्न के बारे में बताएंगे, जो किसान नेताओं को बहुत आकर्षक लगता है. लेकिन सच ये है कि MSP भारतीय अर्थव्यवस्था का भी दिवाला निकाल देगा और इससे किसानों के हाथ भी कुछ नहीं लगेगा. इसलिए आज हम MSP की पूरी ABCD आपको समझाएंगे. लेकिन सबसे पहले आप ये समझिए कि किसानों की 6 मांगें क्या हैं?

क्या हैं किसानों की 6 मांगें?

पहली मांग है कि देश में MSP को संवैधानिक दर्जा दिया जाए. यानी MSP पर फसलों की खरीद सुनिश्चित करने के लिए एक कानून बनाया जाए, जो ऐसा नहीं होने पर आरोपियों को दंडित कर सके. हमारे देश में MSP की व्यवस्था 55 वर्ष पुरानी है, लेकिन इसे आज तक संवैधानिक दर्जा नहीं मिला है. दूसरी मांग है Electricity Amendments Bill को वापस लिया जाए. इसके तहत अभी बिजली बिल पर किसानों को जो सब्सिडी मिलती है, वो बाद में Direct Benefit Transfer के जरिए मिला करेगी. इसके अलावा किसानों का आरोप है कि बिजली की दरें भी पहले से बढ़ा दी जाएंगी, जिससे खेती करना और भी मुश्किल हो जाएगा.

तीसरी मांग ये है कि मौजूदा कानून में पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ जो सजा का प्रावधान है, उसे खत्म किए जाए. चौथी मांग है कि किसान आन्दोलन के दौरान दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत जिन राज्यों में पुलिस केस दर्ज हुए हैं, उन्हें वापस लिया जाए. अकेले दिल्ली में पिछले एक साल में 53 FIR दर्ज हुई हैं और 183 किसानों को गिरफ्तार किया गया है. इन पर हत्या, दंगे भड़काने, पुलिस को उसका काम करने से रोकने और धमकी देने जैसे गम्भीर मामले हैं. इनमें 26 जनवरी को लाल किले पर हुई हिंसा का वो मामला भी है, जिसमें पुलिस कोर्ट में चार्जशीट जमा करा चुकी है. लेकिन किसान चाहते हैं कि ये मामले वापस ले लिए जाएं.

26 जनवरी को लाल किले पर हुई हिंसा में 425 पुलिसकर्मी घायल हुए थे और लाल किले पर धार्मिक झंडे भी फहराया गया था. इस हिंसा का मुख्य आरोपी दीप सिद्धू था, जिसे बेल मिल चुकी है. सोचिए, क्या हिंसा के ये मामले वापस लिए जाने चाहिए? अगर ऐसा होता है तो फिर भविष्य में दिल्ली दंगों के आरोपियों को भी छोड़ने की मांग की जाएगी और कश्मीर में अनुच्छेद 370 के विरोध में हमला करने वालों का भी बचाव होगा. ये आपको तय करना है कि क्या दंगा भड़काने और हत्या करने वाले लोगों को छोड़ जा सकता है?

किसानों की पांचवी मांग है कि लखीमपुर हिंसा में आरोपी आशीष मिश्रा के पिता और केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को उनके पद से बर्खास्त किया जाए और उन्हें गिरफ्तार किया जाए. आख़िरी मांग है कि किसान आन्दोलन के दौरान मारे गए किसानों की याद में दिल्ली के सिंघू बॉर्डर पर शहीद स्मारक बनाया जाए. किसान संगठनों का कहना है कि इस आन्दोलन में 700 किसान मारे गए हैं. लेकिन इस बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

नोट करने वाली बात ये है कि जो किसान तीन दिन पहले तक केन्द्र सरकार के कृषि कानूनों का विरोध कर रहे थे, वही किसान अब केन्द्र सरकार से MSP कानून बनाने की मांग कर रहे हैं. यानी इस आन्दोलन के केन्द्र में कानून ही है. 

समझें MSP का पूरा गणित

MSP का अर्थ है Minimum Support Price यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य. ये वो न्यूनतम कीमत होती है, जिस पर सरकार किसानों से उनकी फसल खरीदती है. इससे होता ये है कि फसलों के दाम जरूरत से ज्यादा गिर जाने पर भी किसानों की लागत निकल आती है और उन्हें कुछ ना कुछ मुनाफा हो जाता है. भारत में अभी 23 फसलों पर सरकार MSP देती है, जिनमें गेहूं और धान की फसलें प्रमुख हैं. हालांकि भारत में इस व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है.

15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ था, तब देश में MSP जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी. वर्ष 1951-1952 के पहले लोक सभा चुनाव के बाद जब जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने, तब भी इस व्यवस्था को नहीं अपनाया गया. उस समय हमारा देश कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं था और दूसरे देश हमारी खाद्य जरूरतों को पूरा करते थे. देश में अनाज का उत्पादन बढ़ाने की पहली कोशिश वर्ष 1964 में हुई, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक कमेटी बनाई, जिसका काम था गेहूं और चावल का MSP तय करना.

55 साल पुरानी है ये व्यवस्था

लाल बहादुर शास्त्री का कहना था कि किसानों को उनकी उपज के बदले कम से कम इतने पैसे मिलें कि उन्हें कोई नुकसान ना हो. उस समय MSP तय करने के लिए कृषि मूल्य आयोग का गठन किया गया, जिसका नाम बदल कर अब कृषि लागत और मूल्य आयोग हो गया है. भारत सरकार की यही एजेंसी आज देश में 23 फसलों का MSP तय करती है. कुल मिला कर कहें तो MSP की ये व्यवस्था 55 वर्ष पुरानी है. लेकिन सोचिए जो व्यवस्था 55 वर्षों में किसानों के घाटे को कम नहीं कर पाई, क्या उसे कानूनी रूप देने से किसानों की सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी?

इन सवालों का सीधा और संक्षेप जवाब ये है कि MSP के कानून बनने से किसानों की समस्याएं खत्म नहीं होंगी. खासकर देश के उन 86 प्रतिशत किसानों को ज्यादा लाभ नहीं होगा, जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है. इसे आप एक उदाहरण से भी इसे समझ सकते हैं.

छोटे किसान के हाथ रहेंगे खाली

मान लीजिए एक गांव में दो किसान रहते हैं. एक किसान के पास 1 हेक्टेयर जमीन है और दूसरे किसान के पास 10 हेक्टेयर जमीन है. जिसके पास कम जमीन है, वो किसान सालाना 5 क्विंटल धान ही उगा पाता है और जिसके पास जमीन ज्यादा है, वो किसान सालाना 50 क्विंटल धान उगा पाता है. अब सरकार दोनों को उनकी फसल का एक समान न्यूनतम समर्थन मूल्य देती है. लेकिन इससे फायदा उसी किसान को ज्यादा होगा, जिसके पास ज्यादा जमीन है. क्योंकि उसका उत्पादन ज्यादा होगा और मुनाफा भी ज्यादा होगा. जबकि छोटे किसान के हाथ ज्यादा कुछ नहीं आएगा.

वर्ष 2015 में भारत सरकार की एक कमिटी ने बताया था कि देश में MSP का लाभ सिर्फ 6 प्रतिशत किसानों का ही मिल पाता है. यानी 94 प्रतिशत किसान ऐसे हैं, जिन्हें इसका कभी लाभ मिलता ही नहीं. ऐसा दो वजहों से होता है. पहला देश के सभी जिलों में सरकारी मंडियां नहीं हैं, जिससे किसान अपनी फसलें सरकार को आसान से बेच सके और दूसरा सरकार के पास फसलों के स्टॉक के लिए ज्यादा व्यवस्था नहीं है.

94 फीसदी किसानों को कोई फायदा नहीं

अब सोचने वाली बात है कि जो व्यवस्था 94 प्रतिशत किसानों के लिए लाभकारी नहीं है, वो भला देश के किसानों को स्थायी संकट से उबारने का जरिया कैसे हो सकती है? हैरानी की बात ये है कि देश में जिन 6 प्रतिशत किसानों को MSP का लाभ मिलता भी है, उनमें 85 प्रतिशत किसान सिर्फ पंजाब और हरियाणा से हैं. यानी जिन राज्यों के किसानों को इसका लाभ मिल रहा है, वही आन्दोलन कर रहे हैं.

हालांकि हमें इसमें भी कोई आपत्ति नहीं है. ये उनका लोकतांत्रिक अधिकार हैं. लेकिन इन किसानों को आज कुछ आंकड़ें भी देख लेने चाहिए. भारत सरकार किसानों से MSP पर जो अनाज खरीदती है, उसे गरीबों के बीच PDS यानी Public Distribution System के तहत सस्ती दरों पर उपलब्ध कराया जाता है. ये काम भारत सरकार के लिए Food Corporation of India नाम की एजेंसी करती है.

सरकार पर पड़ेगा बहुत बड़ा बोझ

अब सरकार का खर्च सिर्फ MSP तक सीमित नहीं होता. उसे मंडी टैक्स, आढ़ती टैक्स, Rural Development Cess और मजदूरों पर अलग से खर्च करना पड़ता है. सरकारी गोदामों में अनाज को स्टोर करके रखना भी बड़ा महंगा काम है. जैसे अगर गेहूं की MSP ढाई हजार रुपए प्रति क्विंटल है तो PDS में जनता को बांटने में सरकार को लगभग 3200 से 3500 रुपये प्रति क्विंटल खर्च करने पड़ेंगे. लेकिन लोगों को ये गेहूं 2 रुपये प्रति किलोग्राम में ही उपलब्ध कराया जाएगा. पिछले साल लॉकडाउन में तो सरकार ने 80 करोड़ लोगों को ये अनाज मुफ्त में बांटा था.

अब अगर केंद्र सरकार MSP को कानून का रूप दे देती है तो उसे मौजूदा 23 फसलें खरीदने के लिए बाध्य होना पड़ेगा, जिस पर उसका सालाना खर्च 17 लाख करोड़ रुपये आएगा. ये पूरे देश के सालाना बजट का आधा है. इस साल के लिए देश का कुल बजट लगभग 34 लाख करोड़ रुपये है. किसानों की मांगों के अनुरूप अगर सरकार सभी फसलों का MSP देती है तो शायद उसका खर्च देश के सालाना बजट को पार कर जाएगा. एक अध्ययन कहता है कि इतने खर्च के बाद भी देश के केवल 60 प्रतिशत किसान ही MSP पर अपनी फसल बेच पाएंगे. यानी 40 प्रतिशत किसानों को तब भी कोई लाभ नहीं होगा.

अब अगर केन्द्र सरकार ने केवल दो साल तक भी इन 60 प्रतिशत किसानों की फसल MSP पर खरीदी तो पूरा देश Bankrupt यानी दिवालिया घोषित हो जाएगा. यानी देश का दिवाला निकल जाएगा और किसानों के भी हाथ कुछ नहीं आएगा. दूसरा, इससे भारत का बाजार भी पूरी तरह अस्थिर हो जाएगा. वो इसलिए क्योंकि सरकार MSP से नीचे फसलों की खरीद को अपराध की श्रेणी में तो डाल सकती है लेकिन किसी भी Private Player को फसल खरीदने पर मजबूर नहीं कर सकती.

आम लोगों की जेब पर पड़ेगा असर

कल्पना कीजिए अगर केन्द्र सरकार ने ऐसा कोई कानून बना भी दिया और इसके विरोध में देशभर के व्यापारी एक जुट हो गए, तो सरकार क्या करेगी? ऐसे में सरकार पर इन फसलों की खरीद का दबाव बढ़ेगा और देश में एक नया संकट पैदा हो जाएगा. इसका सबसे ज्यादा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा और हो सकता है कि एक किलोग्राम आटा या एक किलोग्राम अरहर की दाल दो से तीन हजार रुपये में भी ना मिले.

इसके अलावा ये भी हो सकता है कि पश्चिमी देशों का जो मीडिया और सरकारें, किसान आन्दोलन को लेकर भारत सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करती आई हैं, वही इस कानून का विरोध करें. अंतरराष्ट्रीय नियम कहते हैं कि कोई भी देश अपनी कृषि GDP के 10 प्रतिशत हिस्से को ही सब्सिडी के रूप में किसानों पर खर्च कर सकता है. अमेरिका और कनाडा जैसे देश पहले से भारत पर इन नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हैं. इसलिए MSP को कानून बनाना स्थायी समाधान हो ही नहीं सकता है.

इनकम सपोर्ट एक कारगर तरीका

Price Support की जगह अगर सरकार Income Support किसानों को देती है तो ये तरीका काफी प्रभावी हो सकता है. अगर MSP की जगह सरकार सभी छोटे बड़े किसानों को सालाना 10 हजार रुपये की राशि देने लगे तो ज्यादा बेहतर होगा, देश भर में इसे लागू करने का खर्च 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपये के आसपास बैठेगा. ये MSP पर आने वाले खर्च से बहुत कम है. इसे दूसरे देशों के उदाहरण से भी आप समझ सकते हैं.

मौजूदा समय में दुनिया का ऐसा कोई देश नहीं है, जहां MSP को लेकर कानून है. एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में भारत समेत 54 देश ऐसे हैं, जहां किसानों को मिलने वाली सब्सिडी पर प्रति दिन 15 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं. लेकिन इस सब्सिडी को देने के तरीके हर देश में अलग-अलग हैं. यूरोपियन यूनियन के 27 देशों में किसानों को इस शर्त पर सब्सिडी दी जाती है कि वो ईको फ्रेंडली तरीकों से खेती करेंगे. उन्हें फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलता है.

अन्य देशों में कैसी है व्यवस्था?

अमेरिका में MSP जैसी तो कोई व्यवस्था नहीं है. लेकिन वहां सरकार किसानों की फसलों का बीमा कराती है और इसका 80 से 90 प्रतिशत खर्च भी खुद उठाती है. अगर कभी ऐसी स्थिति बन जाए, जिसमें फसलों की कीमतें नीचे गिरने लगें तो वहां सरकारी एजेंसियां तय कीमत पर किसानों से उनकी फसलें खरीद लेती हैं. हालांकि ऐसा वहां बहुत कम ही होता है. चीन में किसानों को बिजली, पानी और खेती से संबंधित उपकरणों और सामान पर सब्सिडी मिलती है. लेकिन MSP की व्यवस्था वहां भी नहीं है.

नॉर्वे में सरकार किसानों को इनकम सपोर्ट देती है. यानी एक तय रकम किसानों के खाते में जमा कराई जाती है. न्यूजीलैंड में तो किसानों को मिलने वाली सब्सिडी वर्ष 1985 में ही खत्म कर दी गई थीं. ऐसा करने वाला न्यूजीलैंड दुनिया का पहला देश था. लेकिन इसके बावजूद दुनिया के जिन 10 देशों के किसानों को सबसे ज्यादा समृद्ध और प्रगतिशील माना जाता है, उनमें न्यूजीलैंड के किसान भी आते हैं. सोचिए वहां ना तो सब्सिडी है और ना ही इनकम सपोर्ट, फिर वहां किसानों की स्थिति भारत से बेहतर है.

इसका कारण है कि इन देशों में फसलों की खरीद का जटिल ना होना और MSP से ज्यादा प्रगतिशील खेती के मूल्यों को महत्व देना. इसे आप हमारी इस स्पेशल रिपोर्ट से भी समझ सकते हैं, जो हमने अमेरिका के न्यू जर्सी से तैयार की है. अमेरिका में किसानों को अपनी फसलें बेचने के लिए बिचौलियों का सहारा नहीं लेना पड़ता. इससे किसानों को भी फायदा होता है और फसलों की कीमतें भी स्थिर रहती हैं. 

अमेरिका और भारत के किसानों की तुलना

अमेरिका और भारत के किसानों की स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण करने के लिए हमारी रिपोर्टिंग टीम अमेरिका के न्यू जर्सी पहुंची, जो राजधानी Washington DC से लगभग 200 किलोमीटर दूर है. हम ये समझना चाहते थे कि अमेरिका में खेती किस तरह से जाती है, फसल को बाजार में कैसे पहुंचाया जाता है और क्या वहां भी किसानों और ग्राहकों के बीच बिचौलिए की कोई व्यवस्था है.

इन सवालों का जवाब ढूंढते हुए हम न्यू जर्सी में एक किसान परिवार के घर पहुंचे. यहां पहुंचने पर सबसे पहले हमने एक बोर्ड देखा, जिस पर ये लिखा था कि यहां कौन-कौन सी ताजी सब्जियां और फल लोग खरीद सकते हैं. यानी जहां किसान सब्जियां और फल उगाते हैं, वहीं वो इसे ग्राहकों को भी बेच सकते हैं और उन्हें कहीं जाने की भी जरूरत नहीं होती. लेकिन भारत में इस तरह की व्यवस्था और परम्परा नहीं है.

काफी कमजोर है भारत का किसान

भारत ही नहीं दूसरे देशों की तुलना में भी अमेरिका के किसान कहीं ज्यादा समृद्ध और विकसित माने जाते हैं. वैसे आंकड़ों का शास्त्र कहता है कि अमेरिका की तुलना में भारत में 57 गुना अधिक किसान आबादी है. लेकिन बाजार का शास्त्र कहता है कि अमेरिका की तुलना में भारत का किसान काफी कमजोर और पुरानी तकनीक पर निर्भर है. सबसे अहम अमेरिका के किसान जहां सब्जियां और फल उगाते हैं, वहीं उसे सीधे ग्राहकों को भी बेच भी सकते हैं.

हमारी टीम जब न्यू जर्सी के इस किसान परिवार से मिली तो हमें कई और दिलचस्प बातें पता चलीं. जैसे इस किसान परिवार में सभी लोग खेतीबाड़ी का काम करते हैं. परिवार में एक सदस्य की ड्यूटी है कि वो फसलों के बीज लेकर आएगा. कुछ सदस्य खेतों में काम करते हैं और ऐसा नहीं है कि पूरे दिन उन्हें काम करना होता है. दफ्तर की शिफ्ट की तरह ही उनके काम का समय तय होता है. फिर कुछ सदस्य सब्जियां और फल बेचने के लिए घर के बाहर स्टॉल पर काम करते हैं. इस तरह ये सिस्टम चलता है.

अमेरिका में कृषि की परम्परा को समय दर समय बदला गया है. वहां किसान बनने के लिए लोग Agriculture की पढ़ाई करते हैं. इस क्षेत्र में उनके पास डिग्रियां होती हैं. किसान परिवार से आने वाले लोग भी अपने बच्चों को इस क्षेत्र में पढ़ाई करने के लिए दूसरे राज्यों में भेजते हैं और यही वजह है कि वहां खेती मॉनसून से ज्यादा नई तकनीक पर निर्भर है. अमेरिका और भारत के किसानों की स्थिति को आप कुछ आंकड़ों से भी समझ सकते हैं.

आय के मामले में पिछड़े किसान

अमेरिका में एक किसान परिवार औसतन सालाना 83 हजार डॉलर यानी 65 लाख रुपये कमाता है. लेकिन भारत में एक किसान परिवार की औसतन सालाना आय 1 लाख 25 हजार रुपये है. भारत की 135 करोड़ की आबादी में लगभग 15 करोड़ किसान हैं और देश की 60 प्रतिशत आबादी किसी ना किसी रूप में कृषि से जुड़ी हुई है. जबकि अमेरिका में किसानों की कुल आबादी सिर्फ 26 लाख हैं. जमीन के मामले में भी अमेरिका के किसान काफी समृद्ध हैं. वहां एक किसान के पास औसतन 444 Hectare जमीन है. भारत में एक किसान के पास औसतन ढाई Hectare जमीन है. इसी तरह भारत की कुल GDP में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत की है जबकि अमेरिका में ये आंकड़ा 5 प्रतिशत के आसपास है.

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में AIMIM पार्टी के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि वो कृषि कानूनों के वापस होने के बाद अब केन्द्र सरकार से CAA कानून को भी वापस लेने की मांग करते हैं. उन्होंने ये भी कहा कि अगर इस कानून को वापस नहीं लिया गया तो वो फिर से सड़कों पर निकलेंगे और उत्तर प्रदेश में भी शाहीन बाग बना देंगे. हमने आपको आज से 9 महीने पहले फरवरी में ही ये बता दिया था कि अगर कृषि कानून वापस भी हो गए, तब भी ये किसान आन्दोलन खत्म नहीं होगा. उस दिन का वीडिया आजकल काफी वायरल हो रहा है और ये आपने भी किसी Whats App Group या सोशल मीडिया पर देख लिया होगा. 



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